Model Goods & Services Tax Accounting Treatments

GOODS &SERVICES TAX :-


नमस्कार दोस्तों जैसा की हमने गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स में देखा बेसिकली लगभग सारी चीजे अपनी जगह पे आ चुकी ह हम लोगो ने अभी तक ये जाना ह की GST Hard हैं।लेकिन अगर समझ में आ जाये तो पता चलता ह की ये सबसे आसान हैं।अगर GST एकाउंट्स की  आत्मा हैं, प्राण हैं, जो समझलो वो है एकाउंटट्रीटमेंट ।आज हम डेबिट क्रेडिट Financial एकाउंटिंग की बात करेंगे। बहुत ही अच्छा टॉपिक हैं चाहे कोई Accountant हो चाहे कोई प्रैक्टिसनर  कोई bussiness man हो तो आज का ये लेक्चर पूरा सप्पोर्ट करेगा।
 How to maintain books of Accounts with refference to goods and services.तो आइये जानते है किस तरह से बुक्स रखनी पड़ेगी हमे आज वो देखना हैं। हम ITC (INPUT TAX CREDIT) तो चले एक विशेषता जानते हैं हमे अछि तरह मालूम ह की जो हमारे ऊपर टेक्सस लगते ह न वो तीन तरह के लगते है ।अगर हम intra state trade करते ह इसका मतलब एक state के अंदर trade करते हैं तो हमारे ऊपर SGST और CGST लगता हैं ।और अगर हम INTERSTATE TRADE करते ह तो IGST लगेगा ।अब trade का matlab व्यापार होता हैं । तो  यहा पर IGST लगेगा और ADDITIONAL टैक्स लगेगा।अब तक हम लोग VAT मे देखते थे INPUT TAX आता था INPUT TAX CREDIT  लेते थे।ठीक उसी प्रकार GST भी काम करता हैं ।हमने तीन तरह के TAX देखे SGST, CGST और IGST। CGST का INPUT हम CGST के OUTPUT TAX  में SETOFF कर सकते हैं अगर कोई सामान खरीदते समय SGST का पेमेंट किया था अब अपने सामान बेचा तो आप को SGST का पेमेंट करना हैं तो आपने जो SGST दिया था उसमें ADJUST करा सकते हैं।तो SGST की FIRST PRIORITY SGST हैं। तो CGST की सबसे पहली PRIORITY CGST हैं। SGST की बात करे तो IN THE SAME WAY ।NOW AFTER THAT IGST। SGST से IGST का भी पेमेंट हो सकता हैं।FIRST PRIORITY IGST TO IGST। अगर उसके बाद बचा तो SGST. IGST का SHARING SGST और CGST के बीच मे होता है तो मिलेगी।यानी CGST का SGST में USE मत करना।SGST का BENIFIT नही मिलता।  SGST और CGST के आगे INPUT और OUTPUT MENTOIN मत कीजिये और वही LEDGER  SALE, PURCHASES में USE कीजिये। तो अब मेरे पास यदि मेने 100000 का सामान हरियाणा से  सामान ख़रीदा तो vendar कहेगा 118000 दे दो तो ये 18000 का GST हैं मुझे इसका CREDIT मिल जाता हैं।तो मेने लिखा GST RECEVABLE।आप इसके जगह पर कुछ और नाम का इस्तेमाल कर सकते हैं आप ITC का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। ये दो लगाने पड़ते हैं पहला SGST दूसरा CGST। जब ये हरियाणा TO हरियाणा  लगेगा तो 2 TAXES आ जाएंगे एक तो CGST और SGST ये दो आ जायेंगे। और अगर ये 18% हैं तो इसका आधा आधा होगा 9% CGST यर 9% SGST होगा। अगर मान लीजिये हम पंजाब से 100000 की PURCHASES करते तो एंट्री क्या होती। इसमें IGST INPUT एक ही लगता पूरा 18000 इसमें आधा आधा करने की  जरुरत नही हैं। क्योकि ये INTER STATE PURCHASE है

और अगर एक ही STATE से PURCHASE करते तो IGST की जगह पर CGST ओर SGST INPUT आता। इतना तो अब आप जान ही गये होंगे की किस तरह हम SGST, CGST, IGST INPUT का USE करते हैैं।

GOODS AND SERVICE TAX COUNSIL INFORMATION


                                      



जीएसटी से संबंधित सभी शिकायतों का समाधान:-
  जीएसटी पोर्टल पर बढ़ती कंप्लेंट को देखते हुए सरकार ने अब एक बड़ा प्लेटफॉर्म बनाया है, जो जीएसटी पोर्टल पर हेल्पडेस्क की जगह की जगह लेगा। जीएसटीएन ने एक कंप्लेंट सेल बनाई है, जहां पर जीएसटी से संबंधित सभी शिकायतों को दूर किया जाएगा। नए सिस्टम के बाद कारोबारियों की प्रॉब्लम का सॉल्यूशन कम समय में किया जाएगा।  
बढ़ रहीं थी जीएसटी पोर्टल पर शिकायतें
जीएसटी पोर्टल के अधिकारी ने बताया कि वेबसाइट पर शिकायत करने के तरीके को बेहतर किया गया है। अभी तक हेल्पडेस्क के लिए ई-मेल आईडी बनाया हुआ था जिस पर सारी शिकायतें आ रही थी। शिकायतों का फ्लो बढ़ने के कारण जीएसटी पोर्टल पर ही कंप्लेंट सिस्टम को बेहतर किया गया है। अभी कारोबारी और ट्रेडर्स सीधे जीएसटी पोर्टल की वेबसाइट पर शिकायत कर सकते हैं।   
पहले बना था हेल्पडेस्क
अभी तक किसी भी समस्या के लिए हेल्पडेस्क बना हुआ था जहां ट्रेडर्स और कारोबारी शिकायत कर सकते थे। पर ई-मेल करने का ऑप्शन था लेकिन अब ई-मेल बंद कर दिया गया है। इसके बदले नया शिकायत सिस्टम शुरू किया गया है।   ट्रेडर्स भी कर रहे थे शिकायत
कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के जनरल सेक्रेटरी प्रवीण खंडेलवाल ने   कहा कि पोर्टल पर कई टेक्निकल और फाइलिंग संबंधित दिक्कतें आ रही हैं। ट्रेडर्स ई-मेल के जरिए भी शिकायतें कर रहे थे लेकिन उसका बहुत जल्द निपटान नहीं हो रहा था। कई बार ट्रेडर्स सही तरीके से ई-मेल ड्राफ्ट भी नहीं कर पाते थे, तो उनकी समस्या ठीक ही नहीं हो पा रही थी जिसके कारण शिकायतों की संख्या लगातार बढ़ रही थी।  
ऐसे करनी होगी शिकायत
शिकायत करने के लिए ट्रेडर्स और कारोबारी को जीएसटी की पोर्टल पर जाना होगा। पोर्टल पर सर्विस पर क्लिक कर यूजर सर्विस पर जाना होगा और फिर कंप्लेंट पर क्लिक करना होगा। वहां आपकी शिकायतों के ऑप्शन आएंगे कि आप किस तरह की समस्या फेस कर रहे हैं। अपनी शिकायत पर क्लिक करके फॉर्म भरना होगा। फॉर्म को सबमिट करना होगा जिसके बाद आपको कंप्लेंट नंबर मिल जाएगा। उसके बाद आपकी शिकायत पर काम किया जाएगा। अभी तक ये लिंक एक्टिव नहीं था जिसे हाल में ही एक्टिव किया गया है।
सरकार उपभोक्ताओं के हक में ऐसा उपाय करने जा रही है जिससे गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) की कंपोजीशन (एकमुश्त कर) योजना के तहत पंजीकृत विक्रेता अपने ग्राहक से माल या सेवा पर टैक्स नहीं ले सकेंगे. 
केंद्रीय वित्त मंत्रालय के अधीन काम करने वाला राजस्व विभाग इसके लिए ऐसी इकाइयों को बिल पर अपने जीएसटी पंजीकरण की स्थिति को अंकित करना अनिवार्य करने की योजना तैयार कर रहा है ताकि वे खरीददार से टैक्स न ले सकें. 
एक अधिकारी ने कहा कि अभी एकमुश्त योजना में पंजीकृत बहुत सी छोटी इकाइयां ग्राहकों से टैक्स तो वसूल लेती हैं पर उसे सरकार के खजाने में जमा नहीं कराती. अधिकारी के अनुसार बाजार में अभी यह गड़बड़ी खूब चल रही है. पर इस उपाय को लागू किए जाने से इस पर रोक लगेगी. 
अधिकारी ने बताया कि राजस्व विभाग इस बात का प्रचार कराने की योजना भी बना रहा है कि कंपोजीशन योजना का लाभ ले रही इकाइयां ग्राहकों से जीएसटी नहीं वसूल सकती. इस योजना के तहत छोटे व्यापारियों और विनिर्माताओं को माल की बिक्री पर एक फीसदी की दर से जीएसटी जमा कराना होता है जबकि उत्पादों पर जीएसटी की सामान्य दरें 5, 12 या 18 फीसदी हैं. पर उन्हें ग्राहक से जीएसटी काटने का अधिकार नहीं है. 
रोजमर्रा इस्तेमाल की 40 चीजों पर जीएसटी मे कमी:-
 
जीएसटी काउंसिल की 21वीं बैठक में रोजमर्रा इस्तेमाल की 40 चीजों पर जीएसटी रेट कम करने का फैसला किया है। इसके अलावा छोटी कारों पर जीएसटी दरों को लेकर जीएसटी काउंसिल ने कोई बदलाव नहीं किया है। इस फैसले से आम लोगों को बड़ी राहत मिलने की बात कही जा रही है। 
रबड़ बैंड, झाड़ू, सूखी इमली, रेनकोट, कस्टर्ड पाउडर और अगरबत्ती सहित 40 दैनिक उपभोग की चीजों पर जीएसटी दरें कम करने का फैसला किया गया है। 
जीएसटी काउंसिल ने छोटी कार खरीदने वालों को भी राहत दी है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बताया छोटी कारों के सेस में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा, जबकि पहले माना जा रहा था इन कारों पर लगने वाले सेस में इजाफा हो सकता है। 
जेटली ने कहा कि पेट्रोल और डीजल से चलने वाली छोटी कारें जीएसटी लागू होने के बाद तीन फीसद सस्ती हुई हैं और इन्हें लेकर अभी कोई बदलाव नहीं होगा।  
हालांकि जीएसटी काउंसिल ने तय किया है कि मिड साइज कारों के सेस में 2 पर्सेंट का इजाफा होगा। वहीं बड़ी कारों पर सेस 5 पर्सेंट बढ़ाया गया है। इसके अलावा एसयूवी पर 7 पर्सेंट सेस बढ़ाया गया है, जबकि 13 सीटर वीइकल पर टैक्स में कोई बदलाव नहीं किया गया है।  



Rules Of Income Tax - नए फैसले इनकम टैक्स


                      नए फैसले - इनकम टैक्स


इनकम टैक्स में इस बार इससे संबंधित कुछ नए फैसले या नए नियम लागू किये गए हैं। जो अपनी इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करते समय या पहले एक बार ध्यान से देख लेने बहुत आवश्यक हैं।


1 कंपनी द्वारा जो कमीशन पे किया गया हैं वह कमीशन शक के दायरे में होने पर क्या क्या बिंदु  साबित करने होंगे :- ACIT VS. Khaitan Electronics (2018) Taxpub (DT) 1844 : माननीय कलकत्ता ट्रिब्यूनल : इस केस में कंपनी द्वारा वर्ष के दौरान कई व्यक्तियों को कमीशन अदा किया गया था तथा इस कमीशन को व्यापारिक खर्चे के रूप में प्रोफिट एन्ड लोस अकॉउंट में डेबिट किया गया था।
इस कंपनी के केस की स्क्रूटनी के समय AO महोदय को यह शंका हुई की कंपनियों द्वारा जिन व्यक्तियों को कमीशन अदा किया गया हैं वास्तव में उन व्यक्तियों द्वारा कोई कार्य नही किया गया बल्कि कंपनी द्वारा अपनी इनकम को कम करने के लिए एवं सामने वाले व्यक्तियों की इनकम को बढ़ाने के लिए मात्र एंट्रीज के माध्यम से  कमीशन दिया हैं । इस पर AO महोदय द्वारा कर निर्धारण कार्यवाही के दौरान स्पष्टीकरण मांगा गया । कंपनी द्वारा अपने स्पस्टीकरण में निम्न मुख्य बिंदु बताये गये :-
१. कंपनी द्वारा जो कमीशन अदा किया गया हैं  वह अकाउंट पेयी चेक के माध्यम से किया गया हैं।
२. कंपनी द्वारा कमीशन पर TDS काट कर जमा करवाया गया हैं।
३. TDS सर्टिफिकेट भी  जारी किया गया हैं।
४. जिस व्यक्ति को कमीशन अदा किया गया हैं उस व्यक्ति द्वारा अपनी इनकम टैक्स रिटर्न में  कमीशन को अपनी इनकम में दिखाया गया हैं।
५. कंपनी द्वारा जिन व्यक्तियों को कमीशन अदा किया गया था  उनमे से कुछ व्यक्तियों को अन्य कंपनी से भी कमीशन मिला हुआ हैं।
उक्त डिटेल पेश करने के उपरांत AO महोदय ने इनमे से कुछ व्यक्तियों को  फ़ोन पर संपर्क किया तथा कुछ के पास व्यक्तिगत रूप से स्वयं /इनकम टैक्स इंस्पेक्टर को भेजा गया । जितने व्यक्तियों को कमीशन  दिया गया था उनमे से एक व्यक्ति का पता प्रॉपर नही था ,यानि जो पता एवं सम्पर्क नम्बर दिया गया था उसमें वह व्यक्ति मौजूद नहीं था । उस व्यक्ति से बाद में  जब संपर्क हुआ तो वह व्यक्ति इनकम टैक्स विभाग को यह सुचना नहीं दे पाया कि उसने कितना माल ख़रीदा या कितने माल के आर्डर दिए एवं किस रेट पर आर्डर दिए जिस कारण उसको कमीशन मिला है । इस आधार पर AO महोदय द्वारा कमीशन की राशि को फर्जी माना गया। तथा कमीशन की राशि disallow कर दी।
मामला माननीय ट्रिब्यूनल के समक्ष पहुंचा। माननीय ट्रिब्यूनल ने कंपनी के पक्ष में निर्णय देते हुए कहा कि जाँच के दौरान यदि AO महोदय को कमीशन की राशि की वास्तविकता पर शक हैं तो इसे कमीशन प्राप्तकर्ता से भी प्रॉपर तरीके से जाँच करनी चाहिए थी । जहा तक कंपनी का प्रश्न हैं  उसके द्वारा कमीशन की वास्तविकता को साबित करने के लिए समुचित साक्ष्य पेश कर दिए। माननीय ट्रिब्यूनल ने कंपनी के पक्ष में  निर्णय देते हुए लिखा की :- "Assessee had made payment of commission by Account Payee cheque after deduction of tax at source and those commission agents had reflected commission income in their respective income tax returns.Those parties were in receipt of commission from various person other than the assessee.Hence, if at all there was any doubt, AO could verified  the same with concerned vendors to ascertain the varacity of the transections which was not done.Fact of randering of serviece by commission agents to the assessee has been proved beyond doubt and accordingly,assessee was eligible for deduction of commission expenditure."

2. सेल्स टैक्स डिपार्टमेंट से प्राप्त  सुचना के आधार पर केस रिओपन किया जा सकता हैं :- Mircon infrastucture (P) Ltd. Vs. ITO (2018)Taxpub (DT)2232 : माननीय  मुम्बई ट्रिब्यूनल  : इस केस में  सेल्स टैक्स विभाग द्वारा किसी व्यापारी के यहाँ जाँच की गई। जाँच में पाया गया कि यह व्यापारी बोगस बिल्स जारी करने का काम करता हैं । इस व्यापारी के यहाँ जाँच के दौरान यह डाटा सेल टैक्स विभाग के हाथ में आ गया की इस व्यापारी द्वारा किस- किस व्यापारी को बोगस बिल दिये गए हैं,यानि किस किस व्यापारी ने अपने लाभ के लिए accomodation entries ली हैं। सेल टैक्स विभाग द्वारा इसकी गहराई से जाँच करके फाइनल डाटा इनकम टैक्स विभाग को  भी सौंप दिया। इस डाटा के आधार पर इनकम टैक्स विभाग द्वारा जिस व्यापारी ने बोगस खरीद के बिल लिए थे उसका केसर रिओपेन कर दिया। व्यापारी द्वारा इस बिन्दु पर आपत्ति की गई  की अन्य विभाग से प्राप्त सुचना के आधार पर इनकम टैक्स का केस रीओपन नहीं किया जा सकता । इस तर्क को AO महोदय द्वारा स्वीकार नहीं किया गया। मामला अपील में पहुंचा अपील में भी मामला कंपनी के विरुद्ध लिया गया। और यह कहा कि वर्तमान मामले के तथ्यों के अनुसार सेल टैक्स विभाग से प्राप्त सुचना के आधार पर इनकम टैक्स का केस रीओपन करने की कार्यवाही सही हैं। माननीय ट्रिब्यूनल ने लिखा की :-  "AO reopend case of assessee on accounts of information received investigation of wing of sale tax department that assessee was a beneficiary of an accomodation bills of purchases from certain bogus dealers.Assessee contended that merely on the basis of information received from sale tax department.it could not be construed that assessee was a beneficiary of such  bogus entries providers, so as to allow AO to reopen the assessment based on mere surmises.Tribunal held that,। Apparently tengibal and congent incrimineting meterial were received by AO,Which clearly showed that assessee was beneficiary of bogus purchases entries from bogus entry providers.The information show received by AO had live link with reason to believe that income has escaped  assessment.Thus reopening was justified."

3.कैपिटल गेन की डिडक्शन disallow करने पर पेनल्टी की क्या स्थति बनेगी:- नितिन कुमार देसाई  vs ACIT (2018)162 TR(A) 313:- इस केस में अहमदाबाद  ट्रिब्यूनल ने लिखा की  करदाता द्वारा शहरी  एग्रीकल्चर लैंड बेचने पर जो कैपिटल गेन हुआ उसे अन्य एग्रीकल्चर लैंड खरीदने में  इन्वेस्ट करने के आधार पर धारा 54 B की छूट  अपनी इनकम टैक्स रिटर्न में क्लेम की। इस रिटर्न की स्क्रूटनी के समय यह पॉइंट सामने आया की करदाता द्वारा जो नई कृषि भूमि में  इन्वेस्टमेंट किया गया हैं वो इन्स्टालमेन्ट में किया गया हैं,यानि नई कृषि भूमि के लिए जो पेमेंट की गई हैं वो एक साथ न करके किश्तों में की गईं हैं । AO महोदय ने इस केस का फैसला करते समय जितनी पेमेंट रिटर्न फाइल करने की ड्यू डेट तक अदा की उतनी पेमेंट की छूट दे दी गई।तथा शेष रकम बाबत धारा 54 B की छूट अस्वीकार कर दी। इसके बाद करदाता के खिलाफ धारा 271 (1)(c) की पेनल्टी इस आधार पर लगा दी की उसने इनकम टैक्स रिटर्न में गलत छूट क्लेम की हैं । करदाता ने पेनल्टी के आदेश के आधार पर अपील की । अपील में करदाता का यह कहना था कि  उसके द्वारा एक कृषि भूमि बेच कर दूसरी कृषि भूमि खरीद ली गईं। ऐसे में उसे इस बात का सद्भाविक विस्वास था कि इनकम टैक्स में ऐसी परिस्थति पर टैक्स नही लगता। और माननीय ट्रिब्यूनल द्वारा इस केस में करदाता के पक्ष में ही फैसला लिया गया। और करदाता के ऊपर लगाई गई पेनल्टी को डिलीट कर दिया गया। "Penalty was deleted."

4.Form 26 AS में आ रही इनकम एवं प्रॉफिट एन्ड लोस अकाउंट में आ रही इनकम  में अंतर होने पर इसे स्पष्ट करना होगा :- Maru health care(P) Ltd. Vs DCIT(2018) Taxpub(DT)1468:- माननीय जयपुर ट्रिब्यूनल द्वारा इस केस में कंपनी के 26AS में यह दिखाई दे रहा हैं कि कंपनी को कमीशन की इनकम प्राप्त हुई हैं जबकि प्रोफिट एंड लोस अकाउंट में कमीशन की इनकम इससे कम दिखाई हुई हैं। इस बाबत कंपनी से स्पष्टीकरण व Reconcilation statment माँगा गया । कंपनी द्वारा इस अंतर को स्पष्ट नही किया गया। ऐसे में AO महोदय द्वारा इस अंतर की राशि को  कंपनी की इनकम में जोड़ दिया । मामला अपील में ट्रिब्यूनल के समक्ष पहुंचा ।माननीय ट्रिब्यूनल द्वारा यह कहा गया की जहा करदाता फार्म 26 AS एवं प्रॉफिट एंड लोस  अकाउंट में आ रहे अंतर को स्पष्ट नहीं कर पाया  हैं वहा ऐसे अंतर का एडिसन जायज हैं। माननीय ट्रिब्यूनल ने लिखा:-"Assessee had not submitted any evidence,which could reconcile the diffrence between income the declared by the assessee in the Profit and lose account with 26 AS form.The onus was on the aasessee to explain the discrepancy.since the assessee had  failed to discharge primary onus with regard to explain the difference in the receipts  of the commission,therefore addition was justified."

NOTE:- वर्तमान नियमो के तहत  करदाता व उसके वकील/सी ए की यह ड्यूटी ह की  वह इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने से पूर्व  फॉर्म 26 AS को चेक कर लेवे। तथा 26 AS में जो इनकम एवं टीडीएस की रकम show हो रही हैं  से अपनी इनकम टैक्स रिटर्न से incorporate लेवे। यदि 26 AS में कोई गलत एंट्री show हो रही हैं या टीडीएस कम show हो रहा हो तो करदाता की यह ड्यूटी हैं कि वह सम्बंधित deductor से संपर्क करके उसे टीडीएस रिटर्न रिवाइज करने का निवेदन कर अपना 26 AS फॉर्म सही करवा लेवे। आजकल इनकम टैक्स की रिटर्न की प्रोसेसिंग के समय  सिस्टम  द्वारा 26 AS से मिलान किया जाता हैं। यदि मिलान नहीं होता तो Mismatch का नोटिस आ जाता हैं। अतः इस दिशा में विशेष सावधानी की आवश्यक्ता हैं।

इनकम टैक्स,प्रॉपर्टी,TDS, कैपिटल गेन सम्बंधित आपके Question एंड Answer ,



             आपके प्रश्न --इनकम टैक्स
                    


प्रश्न 1 -  मेरे द्वारा कुछ समय पूर्व एक मकान बेच कर दूसरा मकान खरीदा गया ।जब मेरे द्वारा अपनी इनकम टैक्स रिटर्न फाइल की गई तो उसमें कैपिटल गेन संबंधी कैलकुलेशन नहीं दिखाई गई । इनकम टैक्स विभाग से मुझे इस रिटर्न के लिए स्क्रूटनी का नोटिस प्राप्त हुआ ।स्क्रूटनी का नोटिस प्राप्त होने के बाद मैंने अपनी इनकम टैक्स रिटर्न को धारा 1 3 9 (5) के तहत रिवाइज करते हुए कैपिटल गेन के तहत धारा 54 की छूट क्लेम कर ली ।इस संबंध में निम्न दो बातों को स्पषट कीजिये -
1. क्या धारा 1 4 3 (2) के तहत स्क्रूटनी का नोटिस जारी होने के उपरांत धारा 1 3 9 (5) के तहत  रिटर्न रिवाइज की जा सकती हैं ?
2. क्या धारा 54 ( कैपिटल गेन सम्बन्धी ) छूट की जो मूल रिटर्न में क्लेम नही की गई हैं,उसे रिवाइज रिटर्न में क्लेम किया  जा सकता हैं ?

उत्तर :- धारा 1 3 9 (5) में कही इस आशय की पाबन्दी नही हैं कि स्क्रूटनी का नोटिस जारी होने के उपरांत रिटर्न रिवाइज न की जा सकती हो। इस प्रकार आपने सही रूप से रिटर्न रिवाइज की हैं । धारा 54 या 139 (5)  में इस प्रकार की कोई शर्त नही हैं कि कैपिटल गेन संबंधी छुट क्लेम न की जा सकती हो।
हाल ही में माननीय मुंबई ट्रिब्यूनल द्वारा  दिनांक 20:06:2018 को Mahesh H. hinduja vs income tax officer (ITA No.176/mum/2017 ) में इन्ही तथ्यों पर फैसला  देते हुए लिखा की There is no fetters imposed इन section 1 3 9 (5) that it can not be filed after issuance of notice under section 1 4 3 (2).


प्रश्न 2 :- हमारे द्वारा पिछले कई वर्षों से हॉस्पिटल चलाया जा रहा हैं। हॉस्पिटल में ऑपरेशन थियेटर के लिए लगभग  10 वर्ष पूर्व कुछ इक्विपमेंट लिए गए थे ।इन इक्विपमेंट का काफी वर्षो तक उपयोग करने तथा आपरेशन की तकनीक में तेज़ी से परिवर्तन आने के कारन ये इक्विपमेंट अब usable नहीं रहे । यहाँ तक की इन्हें सेकेंडहैंड के रूप में बिलकुल कम कीमत पर भी कोई नही खरीदता । इस कारण हमारे द्वारा पिछले 10 वर्षों का डेप्रिसिएशन घटाने के बाद जो वैल्यू बुक्स ऑफ़ एकाउंट्स में आ रही थी उसे हमारे प्रॉफिट एंड लोस अकाउंट में खर्चे के रूप में ट्रांसफर कर दिया ,यानि इन्हें writeoff कर दिया ।क्या यह खर्चा allowable expenditure माना जायेगा ?
उत्तर :- माननीय बॉम्बे हाइकोर्ट द्वारा एक केस में यह फैसला दिया गया हैं कि जहा किसी हॉस्पिटल द्वारा काफी वर्षो से किसी इक्विपमेंट्स को प्रयोग करने के बाद उसकी उपयोगिता पूर्ण रूप से समाप्त हो जाने से उसे प्रॉफिट एंड लोस अकाउंट में राईट ऑफ किया जा सकता हैं ।इस केस में माननीय हाइकोर्ट ने हॉस्पिटल के पक्ष में फैसला देते हुए लिखा की- "Assessee a charitable trust running hospital ,claimed additional depreciation only for purpose of writting off the value of assests on hospitals equipments which had completed usefulness of 10 years.Assessee could not sell the hospital equipments as scrap nor the assessee cold use the hospitals equipments.Therefore the written down value of the hospital equipments.was to be allowed as depreciation."
इस केस में माननीय हाइकोर्ट में  यह भी निर्णय दिया गया कि खर्चा किस नाम से प्रॉफिट एंड लोस एकाउंट्स में डेबिट किया गया हैं यह इतना महत्वपूर्ण नही हैं।बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि खर्चे की नेचर क्या हैं। इस केस में हॉस्पिटल द्वारा इक्विपमेंट्स की जो WDV थी उसे प्रॉफिट एंड लोस एकाउंट्स में डेप्रिसिएशन के नाम से ट्रांसफर किया।जबकि वास्तव में इस केस के पीछे की मूल भावना यह थी की अब इन इक्विपमेंट्स का जीवन पूरा हो चूका हैं तथा इनका उपयोग नई तकनीक के कारण संभव नही हैं। इस कारण इसकी बची हुई वैल्यू को खर्च खाते में डालकर राईट ऑफ कर दिया जाये ।माननीय हाइकोर्ट ने लिखा - Nomenclature could not decide a claim,in any case,this could also be allowed as expense u/s 371(1) as it was an expenditure incurred wholly and exclusively carrying out it activity as a hospital.
                                 




प्रश्न -3:-हमारे द्वारा कुछ वर्ष पूर्व फैक्ट्री में कुछ जोबवर्क ठेके पर करवाया गया। ठेकेदार द्वारा हमे 30 मार्च को अपना बिल दिया। इस बिल को हमने अपनी बुक्स में 30 मार्च को एंटर कर लिया। इसका भुगतान हमारे द्वारा अगले वितीय वर्ष में 20 जून को किया गया। हमारे द्वारा TDS 30 मार्च के हिसाब से न काटकर 20 जून के हिसाब से कटा गया। इस कारण 31 मार्च को समाप्त हुए वर्ष में स्क्रूटनी का फैसला करते समय यह खर्चा इनकम टैक्स एक्ट की धारा 40(a)(ia) के तहत disallow कर दिया गया ।हमे उस समय यह राय मिली की जहा खर्चा Payable हो वहा धारा 40(a)(ia) लागू नही होती। इस बारे में अपनी राय दे ।?
उत्तर :- पिछले कुछ वर्षो से विभिन्न न्याय निर्णयों में यह बिंदु तय हुआ की धारा 40(a)(ia) वहा भी लागू होगी जहा खर्च paid नही किया गया,यानि खर्च अभी Payable हैं।ऐसे में व्यापारी को यह ध्यान रखना हैं कि जिस समय खर्चे का जमा खर्च किया गया हैं उसी समय TDS काट लिया जाये । हाल ही में विशाखापट्नम ट्रिब्यूनल द्वारा ACIT. VS The gunture co-operative Central bank(2018) 193 TTJ 870 के केस में यह फैसला दिया की- "The world 'Payable' occurring in section 40(a)(ia) not only covers cases where amount is yet to be paid but also the cases where amount has actually been paid.Therefore,disallowance made by AO was justified."

प्रश्न -4 :- मेरे द्वारा एक प्रॉपर्टी बेचीं गई हैं। इस प्रॉपर्टी को बेच कर मैं अन्य रिहायशी प्रॉपर्टी खरीदना चाहता था लेकिन suitable house प्रॉपर्टी उस समय नहीं मिल पाई। मेरे द्वारा गलती से यह रकम कैपिटल गेन अकाउंट स्कीम में जमा करवाने की बजाय बैंक में अपने खाते में जमा करवा दी। क्या बैंक में जमा करवाई गई इस रकम के सम्बन्ध में मुझे धारा 54 में कैपिटल गेन में छूट प्राप्त हो जायेगी ?
उत्तर :- नहीं,धारा 54 में यह स्पष्ट रूप से अंकित हैं कि आपके द्वारा निश्चित समयावधि में रिहायशी मकान नही खरीदा जा सका तो आप इस रकम को बैंक में एक अलग अकाउंट जो की कैपिटल गेन स्कीम अकाउंट के तहत हो उसमे जमा करवाये। चूँकि आपके द्वारा रकम कैपिटल गेन अकाउंट स्कीम में जमा नही करवाई बल्कि साधारण बैंक खाते में जमा करवाई हैं ऐसे में आपको कैपिटल गेन के सम्बन्ध में आपको धारा 54 की छूट का लाभ नही मिल पाएगा ।
माननीय मुम्बई ट्रिब्यूनल द्वारा kapil Rajkumar jain vs ITO के केस के सम्बन्ध में दिनांक 13:03:2018 को यह फैसला दिया गया हैं कि- Amount deposited with a Bank did not fall within the purview of capital gains Accounts Scheme,Therefore,AO, had rightly denied deduction under section 54.

प्रश्न 5:- मेरे द्वारा अपने बैंक खाते में से लगभग दो लाख रूपये निकलवाये।कुछ महीनो बाद मेने अपने बैंक खाते में दो लाख रूपये वापिस जमा करवाये । मेरे केस की स्क्रूटनी के दौरान जो रकम मेरे द्वारा बैंक में जमा करवाई गई उन एंट्रीज का Source पूछा रहा हैं।क्या बैंक से निकलवाई गई रकम कुछ माह बाद वापिस बैंक में जमा करवाई जा सकती हैं ?
उत्तर :- यह मामला केस की परिस्थियों पर निर्भर करता हैं,इसे समझने के लिए माननीय delhi  हाइकोर्ट द्वारा jya agarwal vs ITO 302 CTR( Del) 241
केस को पॉइंटवाइज देखते हैं :-
(A) करदाता का केस बैंक में कैश डिपाजिट के आधार पर स्क्रूटनी में लिया गया  ।
(B) करदाता द्वारा 02:05:1997 को अपने बैंक से दो लाख रूपये नगद निकाले गए।
(C) करदाता द्वारा 13:01:1998 को अपने बैंक खाते में 1.60लाख रूपये नगद जमा करवाये गये।
(D) करदाता का कहना था कि उसका प्रोपर्टी लेने का विचार था और जब प्रोपर्टी का सौदा करना होता हैं तो कुछ रकम एडवांस में देनी होती हैं इस उद्देश्य से मई माह में रकम निकली गई । करदाता कई माह तक प्रॉपर्टी खरीदने का प्रयास करता रहा लेकिन बात नही बनी। अंत में उसके द्वारा दो लाख रूपये में से 1.60 लाख रूपये वापिस जमा करवा दिए गए।
(E) ITO महोदय का कहना था कि रकम निकलवाने व  जमा करवाने के बीच में सात माह का अंतर हैं तथा कोई भी समझदार व्यक्ति सात माह तक बड़ी रकम कैश में नही रखेगा। इस कारण करदाता द्वारा जो जवाब दिया गया हैं वो महज एक स्टोरी लगती हैं ।इस आधार पर ITO महोदय ने इनकम टैक्स एक्ट की धारा 68 के तहत एडिशन कर दिया । प्रथम अपील में कमिसनर महोदय द्वारा  भी करदाता की अपील को ख़ारिज कर दिया गया।
(F) माननीय हाइकोर्ट ने करदाता के पक्ष में निर्णय देते हुए कहा कि - Explanation given was not fanciful or sham story.it was perfectly possible and should be accepted.unless there was justification and ground to hold to the contrary. Due regard and latitude to human conduct  and behaviour has to be given and accepted when one considers validity and truthfulness of an explanation. One should not consider and reject an explanation as conducted and contrived by applying prudent man's behaviour test.Assessment order and the appellate orders fell foul and head and disregarded the preponderance of probability test thus. Addition was deleted.
इस प्रकार जहा करदाता यह साबित कर देता हैं की जो रकम बैंक में नगद जमा करवाई गई हैं वह पूर्व में नगद निकाली गई थी वहा धारा 68 का एडिशन नहीं बनता।

प्रश्न 6:- हमारे द्वारा हॉस्पिटल में कुछ स्टाफ को कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर रखा गया हैं।इनको जो पेमेंट दी गई उस पेमेंट पर हमने इनकम टैक्स एक्ट की धारा 1 9 4 C के तहत 1 % की रेट से TDS काटा । इस केस की स्क्रूटनी के दौरान AO महोदय का कहना हैं कि आपके द्वारा जो कॉन्ट्रैक्ट बेस पर प्रॉफेसनल स्टाफ रखा गया हैं उस पर इनकम टैक्स एक्ट की धारा 1 9 4 जे के तहत 10 % की रेट से TDS काटा जाना चाहिए था । इस कारण आपने  जो कॉन्ट्रैक्ट बेस पर रखे गए प्रॉफेसनल स्टाफ  को भुगतान किया हैं वह इनकम टैक्स एक्ट की धारा 40 (a)(ia) के तहत Disallow हो जायेगा । इस विषय पर कानूनी स्थति क्या हैं ?
उत्तर :- इनकम टैक्स एक्ट की धारा 40 (a)(ia) कहती हैं कि जो व्यापारी TDS के दायरे में आता हैं                
उसकी यह ड्यूटी है कि इनकम टैक्स एक्ट के तहत जिन मदो पर TDS काटा जाना हैं उन मदो का भुगतान यदि कंपनी द्वारा किया जाना हैं  तो उस पर नियमानुसार TDS काट कर जमा करवाया जाए। यदि ऐसा नही किया जाता तो यह खर्चा Allow नही होता । पूर्व में यह सारा खर्चा Disallow हो जाता था । वर्तमान में यह केवल 30 प्रतिशत ही Disallow होता हैं। इनकम टैक्स कानून में  TDS के सम्बन्ध में वर्तमान में दो महत्वपूर्ण स्थति हैं-  पहली Non deduction of Tax, व दूसरी Short deduction of Tax.आपके केस में  आपके द्वारा सद्भाविक रूप से एक सेक्शन की बजाय दूसरे सेक्शन में TDS काट लिया गया हैं। इसके साथ-साथ कोई TDS धारा 1 9 4 C में कवर होता हैं  या 1 9 4 J में यह एक डीबेट का विषय हैं । विभिन्न ट्रिब्यूनल द्वारा यह फैसला दिया जा चूका हैं  की शार्ट डिडक्शन मामलो में धारा 40(a)(ia) लागु नही होती ।

GST, reverse charge , न्यू रिटर्न फाइलिंग सिस्टम, थ्रेसहोल्ड लिमिट फ़ॉर कम्पोजीशन स्कीम एंड GST लेटेस्ट अपडेट्स


All New Updates About GST




  • GST Tax slabs क्या हैं? :-
  • GST Council के द्वारा बनाये गए नियमों अनुसार GST Tax के चार Slab होंगे। 5%, 12%, 18%, और 28% । इन सब में Luxury Items पर अधक्तम Tax लगाया जाएगा यानी की 28% और रोजाना उपयोग में आने वाली जीवन ज़रूरी चीजों पर कम से कम टैक्स यानी की 5% Tax लागू होगा। बाकी Tax Slab चीजों की उत्पादन, आयात, निकास और जरूरतों के अनुसार Apply किये जाएंगे। यह सिस्टम वर्ष 2017 इसी वर्ष जुलाई से लागू होना है। इस आसान Tax सिस्टम से आम लोगों को काफी फायदा होगा। Tax Regulation System भी आसान होगा। बड़ी Companies को कारोबार करने में आसानी होगी।
मुख्यालय से दूसरे राज्यों में दी जाने वाली सर्विसेस को माना जाएगा सप्लाई, सैलरी पर लगेगा 18%  GST  मुख्यालय से दूसरे राज्यों में दी जाने वाली सेवाओं की सैलरी पर GST :-                                            
किसी कंपनी के हेडक्वार्टर द्वारा दूसरे स्टेट में स्थित उसकी ब्रांच ऑफिस को  अकाउंटिंग, आईटी, मानव संसाधन जैसी सर्विस प्रोवाइड करने के लिए दिए जाने वाली सैलरी पर 18 % GST लगेगा। एडवांस रूलिंग अथॉरिटी (AAR) की कर्नाटक पीठ द्वारा जारी आदेश के अनुसार दो ऑफिसों के बीच इस तरह की गतिविधियां जीएसटी कानून के तहत सप्लाई मानी जाएंगी।
AAR के अनुसार अकाउंटिंग, अन्य प्रशासनिक और आईटी सिस्टम के रखरखाव के संदर्भ में कॉर्पोरेट  कार्यालय में कार्यरत कर्मचारी अन्य राज्यों में स्थित ब्रांचेज के लिए जो काम करते हैं, उन पर सेंट्रल गुडस एंड सर्विसेज टैक्स एक्ट 2017 की धारा 25 (4) के तहत CGST कानून की अनुसूची 1 की प्रविष्टि 2 के अंतर्गत सप्लाई माना जाएगा।

क्या कह रहे हैं जानकार :-
जानकारों के अनुसार इस व्यवस्था का मतलब है कि जिन कंपनियों के ऑफिस मल्टीपल स्टेट में हैं, उन्हें हेडक्वार्टर में कर्मचारियों द्वारा अन्य राज्यों में स्थित ब्रांच को कामकाज में मदद के बदले में GST वसूलना होगा। हालांकि ऐसी सप्लाईज पर लिए जाने वाले GST पर इनपुट टैक्स क्रेडिट  का क्लेम किया जा सकता है। जिन कंपनियों को GST से छूट है, वे क्रेडिट का दावा नहीं कर पाएंगी। साथ ही इससे कंपनियों का कॉम्प्लायंस बर्डेन बढ़ेगा, क्योंकि उन्हें इंटरस्टेट सर्विसेज के लिए इनवॉयस बनाना होगा।

किसे है छूट :-
एएमआरजी एंड एसोसिएट्स के पार्टनर रजत मोहन का कहना है कि इस तरह से सर्विसेज की सप्लाई  पर 18 फीसदी GST लगेगा। यह देशभर में काम करने वाली कंपनियों के लिए झटका है। हालांकि, एजुकेशन, हॉस्पिटल, एल्कोहल और पेट्रोलियम जैसे क्षेत्र को GST से छूट है।

SMS से GST रिटर्न फाइल कर सकेंगे NILL टैक्‍सपेयर्स, जल्‍द आ रहा नया सिस्‍टम :-
GST काउंसिल ने दे दी है मंजूरी, जनवरी 2019 से लागू करने की है प्‍लानिंग :-
कारोबारियों को गुड्स एंड सर्विसेज टैक्‍स (GST) रिटर्न भरने में आसानी रहे, इसके लिए जीएसटी काउंसिल ने GST रिटर्न फाइलिंग के लिए एक नए और सरल फॉर्मेट को मंजूरी दी है। यह नया फॉर्मेट है मैसेज यानी एसएमएस के जरिए रिटर्न फाइल करने का। इस नए फॉर्मेट के तहत वे कारोबारी एसएमएस से रिटर्न फाइल कर सकेंगे, जिन्‍होंने पूरी तिमाही के दौरान किसी भी तरह की खरीद या सप्‍लाई नहीं की है और इसके चलते उन पर कोई टैक्‍स नहीं बनता है। ऐसे कारो‍बारियों को NILL फिलर्स कहा जाता है। 
यह जानकारी GST कमिश्‍नर ने दी हैं कहा जा रहा है कि इस नए सिस्‍टम के आने से रिटर्न फाइलिंग के टाइम में कटौती होगी। उनके मुताबिक, GST रिटर्न फाइलिंग के लिए नए फॉर्म्‍स के ड्रॉफ्ट स्‍टेकहोल्‍डर्स के सुझाव के लिए सोमवार तक पब्लिक डोमेन पर उपलब्‍ध करा दिए जाएंगे। नए रिटर्न फॉर्म टैक्‍सपेयर्स को अगले साल सितंबर तक संशोधन कर सकने का विकल्‍प देंगे। गुप्‍ता बृहस्‍पतिवार को कन्‍फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्‍ट्री की एक मीटिंग में बोल रहे थे। 
वित्‍त मंत्री अरुण जेटली की अध्‍यक्षता वाली GST काउंसिल ने पिछले हफ्ते नए रिटर्न फाइलिंग फॉर्म को मंजूरी दी थी। ये फॉर्म मौजूदा GSTR-1 और GSTR-3B को रिप्‍लेस करेगा। 

नया रिटर्न फाइलिंग सिस्‍टम जनवरी 2019 से अमल में लाने की योजना :-
रेवेन्‍यु डिपार्टमेंट की योजना नए रिटर्न फाइलिंग सिस्‍टम को जनवरी 2019 से अमल में लाने की है। गुप्‍ता ने आगे कहा कि GST कानून में काउंसिल से मंजूर संशोधनों को मानसून सत्र के दौरान संसद में पेश किया जाएगा। उसके बाद राज्‍य विधानसभाएं इसे पास करेंगी और फिर ये प्रभाव में आएंगे।  

कंपोजीशन स्‍कीम के लिए थ्रेसहोल्‍ड लिमिट 1.5 करोड़ रु. करने का भी प्रस्‍ताव:-
संशोधन के मुताबिक कंपोजीशन स्‍कीम का फायदा लेने के लिए थ्रेसहोल्‍ड लिमिट को 1 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 1.5 करोड़ रुपए किए जाने का प्रस्‍ताव है। हालांकि इस पर आखिरी फैसला होना अभी बाकी है। अन्‍य संशोधनों में रिवर्स चार्ज मैकेनिज्‍म का मोडिफिकेशन, अलग-अलग बिजनेस वर्टिकल्‍स वाली कंपनियों के लिए अलग रजिस्‍ट्रेशन, रजिस्‍ट्रेशन का कैंसिलेशन, नए रिटर्न फाइलिंग कानून और कई इनवॉइसेज को कवर करने वाले कंसोलिडेटेड डेबिट या क्रेडिट नोट जारी किया जाना आदि शामिल है। 


रिवर्स चार्ज का अर्थ – Reverse Charge :-
GST में सामान्यत: Supplier यानि वस्तु या सेवा को बेचने वाला व्यक्ति Customer से GST चार्ज करता हैं और सरकार को जमा करवाता हैं| लेकिन कुछ परिस्थितियों में GST की जिम्मेदारी Supplier पर न होकर Receiver यानि वस्तु या सेवा खरीदने वाले व्यक्ति पर होती हैं, इसे ही Reverse Charge Mechanism (RCM) कहते हैं| Reverse Charge में क्रेता GST का भुगतान विक्रेता को न करके सीधा सरकार को जमा को जमा करवाता हैं| कुछ परिस्थितियों में Partial Reverse Charge भी होता हैं यानि कि GST के कुछ भाग की जिम्मेदारी क्रेता पर और बाकी हिस्से की जिम्मेदारी विक्रेता पर होती हैं|
 उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति किसी Service को Import करता हैं तो यह परिस्थति रिवर्स चार्ज में आती हैं इसलिए इस परिस्थति में क्रेता ने जितनी Value की Service Import की हैं, उस पर वह GST Calculate करके सरकार को जमा कराएगा .
Reverse Charge में GST Registration
 :-
सामान्य रूप से GST में Registration करवाने की जरूरत तब पड़ती हैं जब उसका वार्षिक विक्रय छूट सीमा यानि कि 20 लाख रूपये ( उत्तरी पूर्वी राज्यों में 10 लाख रूपये) से अधिक हो| लेकिन अगर कोई व्यक्ति जो Reverse Charge के अंतर्गत Liable हैं तो उसे Registration करवाना पड़ेगा, भले ही उसकी Annual Sale जीएसटी की छूट सीमा से कम हो| उदाहरण के लिए अगर कोई फर्म, कंपनी या व्यापारी किसी Lawyer यानि कि वकील की सेवाएँ अपने व्यापार के लिए लेता हैं तो वह Reverse Charge में Liable हैं ऐसी परिस्थति में उस फर्म या कंपनी को GST में रजिस्ट्रेशन करवाना पड़ेगा भले ही उसका turnover कितना भी हो

 सरकार ने कुछ सेवाएँ  नोटिफाई की हैं और ऐसी परिस्थितियों में GST की जिम्मेदारी विक्रेता पर न होकर क्रेता पर होगी| ऐसी सेवाएँ निम्न हैं –
सेवाएँ जिन पर रिवर्स चार्ज लागू होता हैं – Services Covered Under RCM
सेवाओं का आयात -Import of Services
ट्रांसपोर्ट एजेंसी की सेवाएँ – Goods Transport Agency Services (GTA)
वकीलों द्वारा प्रदान की गई कानूनी सेवाएँ -Legal Services Provided By Advocates
ओला उबेर जैसी कैब सेवाएँ – Cab Services Provided Through E-Commerce Operators (इसमें GST Charge करने और सरकार को जमा कराने की जिम्मेदारी कैब कंपनी की होगी )

Income Tax Audit के फॉर्म 3CD में भारी परिवर्तन ।


Income Tax Audit के फॉर्म 3CD में भारी परिवर्तन ।
           

       
(इनकम टैक्स ऑडिट संबंधी कार्य में जिम्मेवारी एवं सुचना दोनों बढ़ाई - GST की जानकारी भी इनकम टैक्स ऑडिट में शामिल कर ली गई )
  • इनकम टैक्स विभाग द्वारा नोटिफिकेशन नम्बर 33/2008 दिनाक 20:08:2018 के द्वारा इनकम टैक्स एक्ट की धारा 44AB के तहत होने वाली टैक्स ऑडिट के प्रफोर्मे ( Form 3CD) में भारी परिवर्तन किया गया हैं। यह नये नियम 20 Aug 2018 से प्रभावी  हो जाएंगे । इस प्रकार दिनाक 19:08:2018 तक इनकम टैक्स ऑडिट वर्तमान में चल रहे प्रफोर्मे में अपलोड की जा सकती हैं । चूँकि नये प्रफोर्मे में काफी ज्यादा सूचनाएं मांग ली गई हैं तथा इन सूचनाओं को तैयार करना भी कुछ मुश्किल कार्य हैं ।ऐसे में जिन व्यपारियो के एकाउंट्स लगभग फाइनल हो चुके हैं वे अपना टैक्स ऑडिट का कार्य 19:08:2018 तक यदि  संभव हो तो पूरा करवा ले ताकि उन्हें नए प्रफोर्मे के संबंध में अधिक मेहनत इस वर्ष के लिए न करनी पड़े ।                                                                                                                               


इनकम टैक्स एक्ट की धरा 44AB के तहत मुख्य रूप से निम्न चार केटेगरी के व्यपारियो के लिए अपने एकाउंट्स की टैक्स ऑडिट करवानी अनिवार्य (Mandetory ) होती हैं ।
  (A) ऐसे व्यापारी जिनकी सालाना टर्नओवर 1 करोड़ रु से अधिक हैं।
(B) ऐसे प्रॉफेसनल करदाता जिनकी ग्रॉस रिसिप्ट्स 50 लाख रु से अधिक हैं।
  (C) ऐसे व्यापारिक करदाता  जो इनकम टैक्स एक्ट की     विभिन्न धाराओं के तहत Presumptive Income ( Sec. 44AD, 44AE) के तहत सरकार द्वारा निश्चित की गई रेट से कम रेट से प्रॉफिट दिखा रहे हैं । जैसे किसी व्यापारी की टर्न ओवर 80 लाख रु हैं इस प्रकार के व्यपारियो के लिए इनकम टैक्स एक्ट की धारा 44AD तहत 8% की नेट प्रॉफिट रेट निर्धारित हैं लेकिन मान लीजिए इस व्यापारी का नेट प्रॉफिट 5%ही आ रहा हैं तो उसे अपने एकाउंट्स की ऑडिट करवानी पड़ेगी ।


(D) ऐसे पेशेवर करदाता जो इनकम टैक्स एक्ट की धारा 44ADA तहत 50 % से कम रेट में प्रॉफिट दिखा रहे हैं । धारा 44ADA उन Professionals पर लागू हैं जिनकी ग्रॉस रिसिप्ट्स 50 लाख रु से कम हैं ।
नोट :- ऑडिट के सम्बन्ध में एक छूट यह दी हुई हैं कि जिन व्यापारियो की  बिक्री एक से दो करोड़ रूपये के बीच में हैं तथा वे 8%  की रेट से नेट प्रॉफिट दिखा देते हैं तो उन्हें धारा 44AD के तहत टैक्स ऑडिट नही करवानी होगी ।
नोट :- धारा 44AD में यह भी सुविधा दी गई हैं कि यदि सेल/टर्नओवर कैश की बजाय बैंकिग चैनल से प्राप्त हुई हैं तो प्रॉफिट की रेट 8% बजाय 6% मानी जायेगी ।
इस प्रकार उक्त केटेगरी के करदाताओं को इनकम टैक्स एक्ट के तहत ऑडिट करवानी होती हैं इस ऑडिट को आम बोलचाल में टैक्स ऑडिट कहा जाता हैं । इस ऑडिट को ऑनलाइन रूप से सबमिट करने की अंतिम तिथि वर्ष समाप्ति के बाद 30 सितम्बर होती हैं। यदि इस ऑडिट को ऑनलाइन सबमिट करने में देरी हो जाती हैं तो धारा 271 B के तहत अधिकतम 1.50 लाख रूपये पेनल्टी लग सकती हैं। पेनल्टी की कैलकुलेशन  टर्नओवर का 05 % या 1.50 लाख रूपये दोनों में जो कम हो के हिसाब से की जाती हैं ।
इनकम टैक्स विभाग द्वारा धारा 44AB के तहत जो ऑडिट होती हैं उसके लिए फार्म 3 CD बनाया हुआ हैं । इस फार्म को हाल ही में नोटिफिकेशन  नं 33/2018 दिनांक 20:07:2018 के द्वारा संशोधित (Amend) किया गया हैं ।यदि फार्म 3 CD में किये गए परिवर्तन पर नज़र डालें तो यह तथ्य सामने आता हैं कि समय के साथ-साथ फार्म 3CD को कुछ मुश्किल बनाया जा रहा हैं  तथा उसके तहत सूचनाएं मांगने का दायरा बढ़ाया जा रहा हैं । इस बार जो परिवर्तन किये गए हैं वो 20:08:2018 से लागू कर दिए गए हैं। नए फार्म के तहत ऑडिट करने बाबत पहले की अपेक्षा  अधिक समय एवं अधिक मेहनत करनी पड़ेगी । इसके साथ साथ CA की जिम्मेवारी भी  पहले की अपेक्षा बढ़ जायेगी । इस लेख में इस फार्म में किये गए परिवर्तन की जानकारी देने का प्रयास किया गया हैं ।


Clause No. 19 : फार्म 3CD के पैरा न.19  में सेक्शन वाइज ALLOWNCES की डिटेल फीड करनी होती हैं।इसमें एक नया पॉइंट  32AD जोड़ा गया हैं ।
धारा 32AD में यह जानकारी दी गई हैं कि आंध्रप्रदेश,तेलंगाना,वेस्ट बंगाल के नोटिफाइड बैकवर्ड एरिया में यदि व्यापारी को किसी मैनुफैक्चरिंग कार्य के तहत इस धारा में कोई अलाउंस नई असेट्स के सम्बन्ध में मिलना हैं तो इसकी जानकारी अब टैक्स ऑडिट रिपोर्ट में देनी होगी ।

Clause No.24:- धारा 32AD के तहत यदि किसी असेट्स के मामले में कोई छूट प्राप्त की हैं तो उसे 5 वर्ष तक बेचा या ट्रांसफर नही किया जा सकता । यदि ऐसा किया जाता हैं तो यह व्यापारी की डीम्ड इनकम मानी जाती हैं। इस क्लोज़ में यह जानकारी देनी हैं कि व्यापारी द्वारा धारा 32AD की छूट लेने के बाद उस एसेट्स को 5 वर्ष के अंदर बेच तो नही दिया गया ।

Clause No.26:- धारा 43B के तहत कुछ खर्चो की छूट तभी मिलती हैं जब उसका भुगतान वास्तव में कर दिया जाये । इस नए क्लोज़ में धारा 43B(g) को एड किया गया हैं जिसके तहत टैक्स ऑडिट में यह बताना हैं कि व्यापारी द्वारा रेलवे को कोई भुगतान पैंडिंग रखा गया हैं तो उस खर्चे की छूट नही मिलेगी ।

Clause No.29A:-  इनकम टैक्स एक्ट की धारा 56(2)(ix) कहती हैं कि यदि किसी प्रॉपर्टी को बेचने का सौदा किया तथा सौदा करते समय कोई एडवांस रकम प्राप्त की जो की सौदा कैंसिल होने पर जब्त (Forfeit) कर ली गई तो ऐसी जब्त रकम इनकम मानी जाती हैं ।जैसे किसी व्यक्ति ने कोई सौदा र0 लाख रूपये में किया तथा सौदा करते समय 5 लाख रूपये नगद प्राप्त कर लिए । बाद में खरीददार ने यह सौदा कैंसिल कर दिया जिस कारण से प्रॉपर्टी बेचने वाले ने 5 लाख रूपये जब्त कर लिए । यह 5 लाख रूपये प्रॉपर्टी बेचने वाले की इनकम मानी जाती हैं । टैक्स ऑडिट रिपोर्ट में अब यह भी जानकारी देनी हैं कि करदाता को कोई ऐसी रकम प्राप्त हुई हो जो धारा 56(2)(ix) के तहत करयोग्य हो ।

Clause No.29B :- गिफ्ट में प्राप्त रकम की जानकारी :- इनकम टैक्स एक्ट की धारा 56(2)(ix) के तहत रिश्तेदार के अलावा अन्य किसी से प्राप्त 50 हज़ार रूपये से अधिक की गिफ्ट प्राप्त होती हैं तो वह करयोग्य होती हैं। टैक्स ऑडिट के नए प्रफोर्मे में यह जानकारी भी देनी हैं की व्यापारी को वर्ष के दौरान रिश्तेदार से भिन्न किसी व्यक्ति से 50 हज़ार रूपये के अधिक की गिफ्ट प्राप्त हुई हो ।

Clause No.34 :- TDS व TCS रिटर्न की जानकारी :- जिस व्यापारी की टैक्स ऑडिट की जा रही हैं यदि वह व्यापारी TDS/TCS के  दायरे में आता हैं तो अब टैक्स ऑडिट में यह विवरण देना होगा की उसके द्वारा प्रत्येक तिमाही का फार्म न. 24Q एवं 26Q कोनसी डेट को जमा करवाया गया हैं तथा यह फार्म जमा करवाने की ड्यू डेट क्या थी । इसके साथ साथ ऑडिटर को यह भी वैरिफाई करना होगा की व्यापारी द्वारा अपने TDS व TCS रिटर्न में वह समस्त जानकारी वर्णित कर दी जो की कानून के अनुसार वर्णित करनी अनिर्वाय हैं । व्यवहार में यह देखा जाता हैं कि कई बार TDS रिटर्न में निम्न सूचनाएं फीड  करने से रह जाती है :-
(अ) फार्म 15G/15H के आधार पर बिना TDS काटे जो भुगतान किया गया हैं उसका विवरण ।
(ब) ट्रांसपोर्टर को पैन कार्ड व डिक्लेरेशन लेकर बिना TDS काटे जो भुगतान किया गया हैं उसका विवरण ।
व्यापारी व पेशे वर्ग को यह प्रयास करना चाहिए की TDS रिटर्न में जो भी सुचना मांगी गई हैं वह समस्त सुचना उसमे फीड करे । नये 3CD फार्म में TDS/TCS रिटर्न के सम्बन्ध में निम्न शब्दो का प्रयोग किया गया हैं :-
"whether the statement of tax deducted or collected contains information about all details/transections which are required to be reported.if not,please furnish list of details/ transections which are not reported."

Clause No.36A:- 2(22)(e) Deemed Dividend :- कंपनी के केस में यदि कंपनी अपने शेयर  होल्डर को कोई  रकम एडवांस कर देती हैं  तो वह कुछ शर्तों के पूरा होने पर  डीम्ड डिविडेंड माना जाता हैं । डीम्ड डिविडेंड का विषय काफी डिबेटेबल विषय हैं । फार्म 3CD में ऑडिटर के ऊपर यह जिम्मेदारी डाल दी गई हैं  कि वह उस बिंदु को जाँच करे की वह जिसकी ऑडिट कर रहा हैं  उसे कोई डीम्ड डिविडेंड प्राप्त हुआ हैं तो उसकी डिटेल फार्म 3CD में मेंशन करनी होगी ।

GST संबंधी जानकारी :- GST रिटर्न, रजिस्ट्रेशन, कम्पोजीशन डीलर, रिवर्स चार्ज

GST संबंधी ताज़ा जानकारी :-  GST रिटर्न, रजिस्ट्रेशन, कम्पोजीशन डीलर, रिवर्स चार्ज





(1) GST तिमाही रिटर्न :- GST में रजिस्टर्ड डीलर को जिनकी सालाना टर्नओवर 5 करोड़ रुपये तक हैं उन्हें मासिक की बजाय तिमाही रिटर्न भरने की सुविधा दी जायेगी। इस प्रकार के डीलर्स को अपना टैक्स मासिक रूप से ही जमा करवाना होगा । GSTR-1, GSTR-2 व GSTR-3 को मिलाकर एक आसान फॉर्म बनाने पर सहमति हो गई हैं। ऐसी आशा की जा रही हैं कि यह नया फॉर्म जनवरी 2019 से  लागु कर दिया जायेगा। मीटिंग में इस विषय पर भी चर्चा हुई की रिटर्न में यदि कोई गलती रह गई हैं तो उसमें 1 गलती को सुधारने  का मौका GST में  दिया जाये। जिनकी किसी भी रिटर्न पीरियड में  Purchase - Sale नहीं हैं यानि की जिनकी  nill रिटर्न हैं  ऐसी रिटर्न SMS के जरिये File करने की सुविधा देने का निर्णय भी लिया गया हैं।

(2) कम्पोजीशन डीलर :- कम्पोजीशन स्कीम के व्यवसायों को वर्ष में कुल पांच रिटर्न फाइल करने होंगे जिसमें से चार रिटर्न त्रेमासिक और एक रिटर्न वार्षिक होगा  वर्तमान नियमो के तहत कम्पोजीशन डीलर सिर्फ माल की खरीद -बिक्री ही कर सकते हैं।पूर्व में यह घोषणा की गई थी की कम्पोजीशन डीलर अपनी टर्नओवर का 10 प्रतिशत या 5 लाख दोनों में से जो भी अधिक हो उस सीमा तक सर्विस सेक्टर में भी कार्य कर सकते  हैं । इस संबंध में जल्द ही नोटिफिकेशन जारी करने की घोषणा की गई हैं।
पूर्व में GST कॉउंसिल की मीटिंग में यह घोषणा की गई थी की कम्पोजीशन स्कीम में टर्नओवर 1 करोड़ से बढ़ाकर 1.5 करोड़ की जायेगी लेकिन इस घोषणा को 8- 9 माह बीत जाने के बाद भी  इसके बारे में कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं किया गया। इस मीटिंग में यह तय किया गया कि इस संबंध में जल्द ही नियमो में परिवर्तन किया जायेगा। और जब टर्नओवर बढ़ाये जाने की घोषणा की थी तब कई व्यापारियों की बिक्री में बढ़ोतरी हुई थी और वे कम्पोजीशन फीस भी जमा करवाने लगे लेकिन जब इस संबंध में कोई नोटिफिकेशन जारी नही किया गया तो कई  व्यपारियो के लिए उलझन सी उत्पन हो गई । और कम्पोजीशन स्कीम में टैक्स रेट अलग अलग व्यपारियो के लिए अलग हैं जैसे  - ट्रेडर को 1%, निर्माता को 1% और रेस्टोरेंट के मालिक को 5% की फिक्स् रेट से GST का भुगतान करना पड़ेगा ।
(१)निर्माण क्षेत्र में कम्पोजीशन स्कीम, तम्बाकू और आइसक्रीम निर्माताओं के लिए उपलब्ध नहीं हैं|
(२)सेवा क्षेत्र में कम्पोजीशन स्कीम केवल रेस्टोरेंट व्यवसाय के लिए ही उपलब्ध हैं|

(3) GST रजिस्ट्रेशन:-
नार्थ ईस्ट स्टेट के लिए GST रजिस्ट्रेशन हेतु टर्नओवर सीमा वर्तमान में  10 लाख रूपये निर्धारित हैं। इसे भविष्य में 20 लाख रूपये करने का प्रस्ताव पारित किया गया हैं। एक राज्य में एक करदाता को एक से अधिक रजिस्ट्रेशन (Multipal Registration) देने की सुविधा प्रारंभ करने की घोषणा की गई हैं। जिन डीलर्स ने GST में प्रोविजनल आई डी को अभी फाइनल  रजिस्ट्रेशन में नही बदला उन्हें 31 अगस्त 2018 तक एक और अवसर दिया जा रहा हैं तथा उनके सम्बन्ध में लेट फीस भी माफ़ करने का निर्णय लिया गया हैं। रजिस्ट्रेशन के संबंध में  GST में  एडवांस  रूलिंग अथॉरिटी द्वारा जॉइंट प्लांट कमिटी वेस्ट बंगाल की एप्लीकेशन पर क्रमशः दिनांक 06.04.201821.03.18 को यह फैसला दिया की GST कानून में ऐसा डीलर payable करमुक्त वस्तुओं का कारोबार कर रहा हैं (Engeged exclusively इन Supplying goods and service that were wholly exempt क्रोम tax) उसके लिए GST कानून में रजिस्ट्रेशन अनिवार्य नही हैं। एडवांस अथॉरिटी में यह फैसला दिया गया है कि  ऐसा डीलर ऐसी कोई खरीद या सेवा  ले रहा हैं जिसका ऊपर धारा 9(3) के तहत रिवर्स चार्ज लागु हैं उसे रजिस्ट्रेशन करवाना होगा। इस फैसले में लिखा गया हैं कि " it was held that section 24 is not subject to the provision of section 23 of the GST act.if  a person, is not liable to be registered for making exclusively exempt supplyies but is liable to pay tax under RCM under section 9(3) of the GST act.he shall be required to get himself registred under the GST act.irrespective of the quantum of the aggregate turnover.)



(4) रिवर्स चार्ज सिस्टम :-
GST में रिवर्स चार्ज सिस्टम को पिछले वर्ष अक्टूबर में एक बार पोस्टपोंन कर दिया गया था।अब इसकी अवधि बढाकर 30 सितम्बर कर दी गई हैं,यानि रिवर्स चार्ज सिस्टम अभी पोस्टपोन रहेगा। जो रिवर्स चार्ज धारा 9(4) में कवर होता हैं केवल वही रिवर्स चार्ज पोस्टपोन किया गया हैं।अगर रजिस्टर्ड कारोबारी किसी ऐसे दुकानदार या व्यक्ति से सामान खरीदता है, जो कि GST में  रजिस्टर्ड नहीं है तो खरीदने वाले कारोबारी पर ही रिवर्स चार्ज लगेगा। हालांकि, यह उस रिवर्स  टैक्स को विक्रेता को चुकाई जाने वाली रकम से काटकर रख लेता है। बाद में, खरीदने वाले  व्यापारी को ही सरकार के पास  इस रिवर्स जीएसटी को जमा भी करना पड़ता है। और अगर अगर GST में UNREGISTERED व्यापारी से सामान और सेवाओं की खरीदारी 5000 रुपए प्रतिदिन सेे ज्यादा नहीं है तो फिर ऐसे व्यापारी को रिवर्स चार्ज का भुगतान  करने की जरूरत नहीं है।

Model Goods & Services Tax Accounting Treatments

GOODS &SERVICES TAX :- नमस्कार दोस्तों जैसा की हमने गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स में देखा बेसिकली लगभग सारी चीजे अपनी जगह पे आ चुकी ह हम ल...